क्या चीज़ है ये जवानी भी

क्या चीज़ है ये जवानी भी

बहकाती है यह दुनिया और हम बहकते चले जाते है,
जब दिल टूटता है तब होश में आते है।

कौन किसका कसूरवार है यहा यह कौन जाने ,
हम तो खुद ही को गलत ठहराते है और रिश्ते बचाते है।

परिंदे भी शाम होते घर की ओर मुड जाते है,
यह तो अपने ही कुछ लोग है जो लौट कर फिर कभी नहीं आते है।

सुलझाते है जितना उतनी ही उलझती जाती है
क्या चीज़ है ये जवानी भी , तरसा तरसा के प्यास बुझाती है

#Maheep

फिर क्यों इश्क करने से डरते हो तुम ?

फिर क्यों इश्क करने से डरते हो तुम ?

किसी के इश्क का गवाह, किसी की नाराजगी का मर्ज बन जाता हूं ,
मैं इंसानों के बीच गुलाब से जाना चाहता हूं ।

जो भी देखता है मुझे, चुराना चाहता है ,
तोड़कर ले जाना चाहता है अपने साथ,दूसरों से नजरें बचाकर ।

जब मन भर आता है उसका तो कहीं किसी कोने में रख देता है,
या किताब की किसी पन्नों के बीच दफना देता है मुझे ।

सूखा बेजान हो जाता हूं पर मोहब्बत के अफसानों को संजोए रखता हूं ,
मैं गुलाब अक्सर किसी के पहले प्यार की निशानी बन जाता हूं ।

लोगों की दिल्लगी में, अपनी डाली से बिछड़ कर मुरझाने लगता हूं ,
मैं गुलाब फिर भी अपने अंजाम से नहीं डरता , किसी के इश्क के लिए फना हो जाता हूं ।
इंसान हो तुम तो ,
दो लोगों के प्यार की निशानी हो , फिर क्यों इश्क से डरते हो तुम ?

वह इश्क ही है जो दिल धड़कने पर तुम महसूस करते हो, फिर क्यों उस एहसास को अपनाने से डरते हो ?

वह इश्क ही है जो दौड़ता है रगों में तुम्हारे,
फिर क्यों उसे जीने से डरते हो ?

वह इश्क ही है जिसके लिए बने हो तुम,
फिर क्यों उसके अंजाम से डरते हो ?

मैं गुलाब मर मिटता हूं तुम्हारे इश्क के खातिर फिर क्यों अब  तक इश्क करने से डरते हो तुम ।

– महीप

Ishqvaar – 2 ( love-poetry every Tuesday)

Ishqvaar – 2 ( love-poetry every Tuesday)

Ishqvaar (love poetry every Tuesday) is like that suprising rain of one summer afternoon that forms rainbow of emotions and we all are drenched in love for a moment.

 

जमाने गुजर गए पर आज भी तेरी गली से गुजरने से डरता हूं सोचता हूं

कहीं ठोकर ना लग जाए किसी पुराने पत्थर से और मैं फिर से लड़खड़ा ना जाऊं

– महीप
Zamane Guzar Gaye Par Aaj Bhi Teri Gali Se Guzarne Se Darta Hoon Sochta Hoon

Kahin Thokar Na Lag Jaye Kisi Purane Patthar Se Aur Main Phir Se Ladkhada Na Jau

– Maheep

इश्क़वार

इश्क़वार

था अगर इश्क़ हमसे तो बता भी देते

हम ता-उम्र तेरे रस्मों रिवाजों को निभा देते …

– महीप

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Tha agar Ishq humse toh bata bhi dete
Hum Ta-umr tere rasmo riwazo ko nibha dete…

– Maheep

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Ishqvaar – Poetry on love on every Tuesday

बात बस उसके इश्क की थी / Baat Bas Uske Ishq Ki Thi

बात बस उसके इश्क की थी  / Baat Bas Uske Ishq Ki Thi
वो इश्क मे भी कारोबार करती है
ना जाने देती है मुझे
ना अपनाने की बात करती है
दिल देने की बात कही और भूल गई
वह दिमाग का अच्छा इस्तेमाल कर लेती है ।
– महीप
Woh Ishq Mein bhi Karobaar Karti Hain
Na Jaane deti hai Mujhe
Na Apnane Ki Baat Karti Hain
Dil Dene Ki Baat karti hai aur Bhool jati hain
Woh Dimaag ka acha istamaal kar leti Hain
– Maheep

अगर यह सब जादू नहीं तो क्या है ? / Agar yeh sab Jaadu nahi toh kya hain ?

अगर यह सब जादू नहीं तो क्या है ? /  Agar yeh sab Jaadu nahi toh kya hain ?

क्या है जादू कभी सोचा है ?
क्या काली टोपी से सफेद कबूतर निकालना है जादू
या एक इंसान को बॉक्स मे बीच से काटना है जादू
यह जादू नहीं है
यह सब तो कला है तो फिर आखिर क्या है जादू ?

घबराहे मन से रात भर नींद न आना और दो पल
मां की गोद में बिता कर सुकून की नींद आ जाना है जादू

मेले की भीड़ देख कर डर जाना
वो पिता का हाथ थामना और डर का भाग जाना है जादू

जो किसी के सामने कभी न रोया उस भाई का
अपनी बहन की विदाई मे फूट फूट कर रोना है जादू

दो लोगो का सात फेरो पर लिए गए सात वचनो को
जन्मों तक निभाना है जादू

अपनी बेटी को अपनी दादी-नानी से सुनी कहानियां सुनाना और सुनाते-सुनाते खुद का भी सो जाना है जादू

मां के ना होने पर बहन का मां बन जाना और
अपने नाज़ुक कधों पर पूरे घर का भार उठाना है जादू

उसके गुजर जाने पर उसके पिर लौट आने के इंतजार
में उस रिश्ते को पूरी जिंदगी निभाना और
अपनों का अपनों से बिछड़ जाना
फिर भी उनकी यादों का
ताउम्र हमारा साथ निभाना है जादू …

यह सब जादू नही तो आखिर क्या है
यह सब जादू ही तो है
और हम सब यहा के जादूगर ।

– महीप

 

Kya hai Jaadu kabhi socha hain
Kya kaali topi se safed kabootar nikaalna hai Jaadu
Ya ek insaan ko box main beech se kaatna hainJaadu Yeh jaadu nahi hai
Yeh sab to kala hai toh phir aakhir kya hain Jaadu ?

Ghabraye mann se raat bhar neend na aana aur do pal Maa ki god mai beeta kar sukoon ki neend aa jana hain Jaadu

Mele ki bheed dekh kar darr jana
Woh pita ka haath thaamna aur darr ka bhaag jana hain jaadu

Jo kisi ke saamne kabhi na roya, us bhai ka apni behen ke vidaai mein phoot phoot kar rona hain jaadu

Do logo ka saath phero par liye gaye saath vachano ko janmo tak nibhana hain jaadu

Apni beti ko apni Dadi Nani se suni kahaniyan sunana aur sunate sunate khud ka bhi so jana hai Jaadu

Maa ke na hone par behen ka Maa ban jana aur apne naazuk kandon par poore ghar ka bhaar uthana hai Jaadu

Uske guzar jane par uske phir laut aane ke intzaar mein us rishte ko poori zindagi nibhana aur
Apno ka apno se bichad jana
Phir bhi unki yaadon ka
ta-umr humara saath nibhana hain jaadu…

Yeh sab Jaadu nahi toh aakhir kya hain
Yeh sab Jaadu hi toh hain
aur hum sab yahan ke Jadugar

– Maheep

वो भी तो आ जाती है, बनारसी साड़ी पहने दिल बहलाने के लिए / Woh bhi toh aa jati Hain, Banarasi Sadi pehne Dil behlane ke liye

वो भी तो आ जाती है, बनारसी साड़ी पहने दिल बहलाने के लिए /        Woh bhi toh aa jati Hain, Banarasi Sadi pehne Dil behlane ke liye

जो अब रूठे है खुद ही खुद से
तो क्या तरकीब करे मनाने के लिए,

बुला लेते है उन्हें ख्वाबों में कभी कभी
अपना भी दिल बहलाने के लिए

वो भी तो आ जाती है बनारसी साड़ी पहने,
आहिस्ता कदम उठाती हुई, न पाजेब की आवाज़ किए
हाथों में हल्की रोशनी लिए , बिजली जाने का बहाना किए

सजा रखी है आँखों मे उसने शर्म-ओ-हया
ज़माने को जलाने के लिए,
हमे तो उसी आँखों से कहती है
शम्मा बुझाने के लिए

* महीप*

 
Jo ab roothe Hain khud hi khud se
Toh kya tarakeeb kare manane ke liye,

Bula lete Hain khwabon mein kabhi kabhi
Apna bhi Dil behlane ke liye

Woh bhi toh aa jati Hain, Banarasi Sadi pehne,
Aahista kadam uthati Hui, na pajeeb ki Aawaz kiye
Haathon me halki Roshni liye,
Bijli Jane ka bahana kiye

Saja Rakhi Hain aankhon me usne sharm-o-haya
zamane ko jalane ke liye
Hume toh ussi aankhon se kehti Hain
shamma bujhane ke liye.

*MAHEEP*